इतिहास

हमारे मार्गदर्शक

डॉ केशवराव बलिराम हेडगेवार

"परम पूज्य सरसंघचालक जी"

माधव राव सदाशिव राव गोलवलकर

"द्वितीय सरसंघचालक"

स्वामी विवेकानन्द

"उठो जागो और लक्ष्य को प्राप्त करो"

इतिहास

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक परमपूज्यनीय माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर गुरूजी ने भारतीय वातावरण के अनुकूल संस्कारक्षम शिक्षण पद्धति विकसित करने का विचार किया। इस हेतु 1952 में, संघ प्रेरणा से कुछ निष्ठावान लोग इस पुनीत कार्य में जुट गए, राष्ट्र निर्माण के इस कार्य में लगे लोगों ने नवोदित पीढ़ी को सुयोग्य शिक्षा और शिक्षा के साथ संस्कार देने के लिए “सरस्वती शिशु मंदिर” की आधारशिला पक्कीबाग़ गोरखपुर में पांच रुपये मासिक किराये के भवन में प्रथम शिशु मंदिर की स्थापना से श्रीगणेश किया | इससे पूर्व कुरुक्षेत्र में गीता विद्यालय की स्थापना 1946 में हो चुकी थी, मन की आस्था, ह्रदय का विकास, निश्चय की अडिगता तथा कल्पित स्वप्न को मन में लेकर कार्यकर्ताओं के द्वारा अपने विद्यालयों का नाम, विचार कर “सरस्वती शिशु मंदिर” रखा गया, उन्हीं की साधना, तपस्या, परिश्रम व संबल के परिणामस्वरुप स्थान-स्थान पर “सरस्वती शिशु मंदिर” स्थापित होने लगे| उत्तर प्रदेश में शिशु मंदिरों के संख्या तीव्र गति से बढ़ने लगी. इनके मार्गदर्शन एवं समुचित विकास के लिए 1958 में शिशु शिक्षा प्रबंध समिति नाम से प्रदेश समिति का गठन किया गया| सरस्वती शिशु मंदिरों को सुशिक्षा एवं सद्संस्कारों के केन्द्रों के रूप में समाज में प्रतिष्ठा एवं लोकप्रियता प्राप्त होने लगी,इसी प्रयत्न ने 1977 में अखिल भारतीय स्वरुप लिया और विद्या भारती संस्था का प्रादुर्भाव हुआ|

विद्या भारती - देश का सबसे बड़ा गैर सरकारी शिक्षा संगठन

आज नगरों और ग्रामों में, वनवासी और पर्वतीय क्षेत्रो में झुग्गी-झोपड़ियो में, शिशु वाटिकायें, शिशु मन्दिर, विद्या मन्दिर, सरस्वती विद्यालय, उच्चतर शिक्षा संस्थान, प्रशिक्षण केन्द्र और शोध संस्थान है। इन सरस्वती मन्दिरों की संख्या, विद्यालयों में छात्रो की संख्या और आचार्यो की संख्या निरन्तर बढ़ रही हैं। इसके फलस्वरूप अभिभावको के साथ तथा हिन्दु समाज में निरन्तर सम्पर्क बढ़ रहा है। हिन्दु समाज के हर क्षेत्र में प्रभाव बढ़ा है। आज विद्या भारती भारत में सबसे बड़ा गैर सरकारी शिक्षा संगठन बन चुका हैं।

- कार्य योजना -

भारतीय संस्कृति एवं जीवनादर्शों के अनुरूप शिक्षा दर्शन विकसित करना जिससे अनुप्राणित होकर शिक्षा के लिये समर्पित कार्यकर्ता राष्ट्र के पुनर्निमाण के पावन लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में विश्वासपूर्वक बढ़ सकें।

विश्व के आधुनिकतम ज्ञान, विज्ञान एवं तकनीकी उपलब्धियों का पूर्ण उपयोग करते हुए ऐसी शिक्षण प्रणाली एवं संसाधनो को विकसित करना है जिससे छात्रों के सर्वांगीण विकास के शैक्षिक उद्देश्यों एवं लक्ष्यों की प्राप्ति सुलभ हो सके।

शिक्षा का ऐसा स्वरूप विकसित करना जिसके माध्यम से भारत की अमूल्य आध्यात्मिक निधि, परम सत्य के अनुसंधान में पूर्व पुरुषों के अनुभव एवं गौरवशाली परंपराओ की राष्ट्रीय थाती को वर्तमान पीढ़ी को सौंपा जा सके और उसकी समृद्धि में वह अपना योगदान करने में समर्थ हो सके।

शारीरिक, योग, संगीत, संस्कृत तथा नैतिक एवं अध्यात्मिक शिक्षा के राष्ट्रीय पाठ्यक्रमों, सहपाठ्य क्रियाकलापों एवं अनौपचारिक शिक्षा के आयोजनों से छात्रो में राष्ट्रीय एकता, चारित्रिक एवं सांस्कृतिक विकास को सुदृढ़ करना।

शिक्षण-प्रशिक्षण कार्यक्रमों को विभिन्न स्तरों पर व्यापक एवं प्रभावी रूप से संचालित करना जिससे कुशल, चरित्रवान एवं समर्पित शिक्षकों का निर्माण हो सकें।

आधारभूत व्यवहारिक अनुसंधान एवं विकास के कार्यक्रमों का संचालन एवं निर्देशन करना तथा भारतीय मनोविज्ञान को शिक्षण प्रक्रिया का आधार बनाने हेतु कार्य करना।

उपर्युक्त उद्देश्यों से अनुप्राणित देश में चल रहे शिक्षा संस्थानो एवं संगठनो को सम्बद्ध करना तथा उनका मार्गदर्शन करना विशेष रूप से ग्रामीण, जनजातीय एवं उपेक्षित क्षेत्रा में कार्य विस्तार करना एवं इन क्षेत्रो में दिशा-दर्शी प्रकल्प स्थापित करना।

विद्या भारती विद्वत परिषद् के माध्यम से राष्ट्रीय एवं प्रदेश स्तर की शैक्षिक संगोष्ठियां एवं परिचर्चायें आयोजित करना तथा शिक्षाविदों एवं परामर्श प्रदान करना।

भारत सरकार की राष्ट्रीय शैक्षिक योजनाओं एवं कार्यक्रमों में आवश्यक सहयोग एवं परामर्श प्रदान करना।

देश-विदेश में चल रहे शैक्षिक प्रयोगों एवं अनुभवों के आदान-प्रदान के माध्यम के रूप में कार्य करना एवं उनसे सक्रिय सम्पर्क स्थापित करना।

भारतीय शिक्षा समिति कानपुर प्रान्त

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